Friday, March 3, 2017

खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी

सिंघासन हिल उठे , राजवंशो ने भृकुटि तानी थी

Author-सुभद्रा कुमारी चौहान 

बूढ़े भारत में भी आयी, फिर से नई जवानी थी 
गुमी हुई आज़ादी की, कीमत  सबने पहचानी थी 
दूर फिरंगी को करने की, सबने मन में ठानी थी 
चमक उठी  सन  सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी 
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी 

कानपुर के नाना की ,मुँह बोली बहन छबीली थी          
लक्ष्मीबाई नाम पिता की, वह संतान अकेली थी
नाना के संग पढ़ती थी वह, नाना के संग खेली थी 
बरछी ढाल  कृपाण कटारी, उसकी यही सहेली थी
वीर शिवजी की गाथाये, उसको याद  जबानी थी 
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी 

लक्ष्मी  थी या दुर्गा थी,  वह स्वयं वीरता की अवतार 
देख मराठे पुलकित होते, उसके तलवारो के वार  
नकली युद्ध व्यूह की रचना, और खेलना खूब शिकार 
सैन्य घेरना दुर्ग तोड़ना, ये थे उसके प्रिय खिलवाड़ 
महाराष्ट्र कुल देवी उसकी, भी आराध्य भवानी थी 
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी 

हुई वीरता की  वैभव के साथ सगाई झांसी में 
ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झांसी में 
राजमहल  में  बजी बधाई, खुशिया छायी झांसी में 
सुघट बुंदेलों की विरुदावलि  सी बह आयी झांसी में 
चित्रा  ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी 
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी 

उदित हुवा सौभाग्य, मुदित महलो में उजियाली छायी 
किन्तु कालगति  चुपके - चुपके काली घटा घेर लायी 
तीर  चलाने  वाले कर में, उसे चुडिया कब भायीं 
रानी विधवा हुई हाय, विधि को भी नहीं  दया  आयी 
निःसंतान मरे राजा जी, रानी शोकसमानी थी 
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी 

बुझा दीप झांसी का तब, डलहौजी मन में हर्षाया 
राज्य हड़प करने का उसने, यह अच्छा अवसर पाया 
फौरन फौजे भेज, दुर्ग पर अपना झंडा फहराया 
लावारिस का वारिस बनकर, ब्रिटिश  राज्य झांसी आया 
अश्रुपूर्ण रानी ने देखा, झांसी हुई वीरानी थी 
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी 

अनुनय विनय नहीं सुनता हैं , विकट  फिरंगी की माया 
व्यापारी बन दया चाहता था, जब यह भारत आया 
डलहौजी ने पैर पसारे, अब तो पलट गयी काया 
राजाओ नबब्बो को भी, उसने पैरों ठुकराया 
रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी 
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी

इनकी गाथा छोड़ चले हम,  झांसी के मैदानों में 
जहां खड़ी है लक्ष्मीबाई, मर्द बनी मर्दानों में
लेफ्टिनेण्ट बॉकर आ पहुँचा ,आगे बढ़ा जवानों में
रानी ने तलवार खींच ली ,हुआ दून्दू असमानों में
जख्मी होकर बॉकर भागा ,उसे अजब हैरानी थी
 बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी

रानी बढ़ी कालपी आयी ,कर सौ मील निरन्तर पार
घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल  सिधार
यमुना तट पर अंग्रेज़ो ने ,फिर खायी रानी से हर
विजयी रानी आगे चल दी ,किया ग्वालियर पर अधिकार
अंग्रेजो के मित्र सिंधिया, ने छोड़ी रजधानी  थी
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी

विजय मिली पर अंग्रेजो के फिर सेना घिर आयी थी
अबके जनरल स्मिथ सन्मुख था उसने मुँह  की खायी थी
काना और मंदरा सखिया , रानी के संग आयी थी
युद्ध क्षेत्र में उन दोनों ने , भारी मार मचायी थी
पर पीछे ह्यूरोज आ गया ,हाय घिरी अब रानी थी
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी

तो भी रानी मारकाटकर ,चलती बनी सैन्य के पार
 किन्तु सामने नाला आया ,था यह संकट विषम अपार
घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था इतने में आ गये सवार
रानी एक शत्रु बहुतेरे ,होने लगे वार पर वार
घायल होकर गिरी सिंहनी ,उसे वीरगति पानी थी
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी

रानी गयी सिधार ,चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी
मिला तेज से तेज ,तेज की वह सच्ची अधिकारी थी
अभी उम्र कुल तेइस की थी , मनुष्य नहीं अवतारी थी
हमको जीवित करने आयी , बन स्वतंत्रता नारी थी
दिखा गयी पथ , सीखा गयी हमको जो सीख सिखानी थी
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी

जाओ रानी याद रखेंगे ,हम कृतज्ञ भारत वासी
यह तेरा बलिदान , जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी
होये चुप इतिहास ,लगे सच्चाई को चाहे फाँसी
हो मदमाती विजय मिटा दे ,गोलों से चाहे झांसी
तेरा स्मारक तू ही होगी ,तू खुद अमिट निशानी थी
बुंदेले हर बोलो के मुख, हमने सुनी कहानी थी 
खूब लड़ी मर्दानी, वह तो झांसी वाली रानी थी  


Thursday, March 2, 2017

नर हो न निराश करो मन को


Author- मैथलीशरण गुप्त

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो ,कुछ काम करो
जग में रहकर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर  हो, न  निराश करो मन को।
                                                             
संभालो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
 नर  हो ,न  निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्व यहाँ
फिर जा सकता है सत्व कहाँ
तुम स्वत्व  सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर  हो न  निराश करो मन को।

Tuesday, February 7, 2017

बुढ़ापा


पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है ।  

  
निंदा की नीव बुढ़ापा है,
जीवन संताप बुढ़ापा है,
संस्तृत का पाप बुढ़ापा है,
पुरिखन की आस बुढ़ापा है,
देखतै तन थर थर कापा है,
पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है। 

बचपन मा कनिया चढ्यो खूब
मनमानी बातें गड्यो खूब,
घी दूध खाये कै बढ्यो खूब,
खेल्यो कूद्यो औ चल्यो खूब,
अब सोचि रह्यो का पापा है,
पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है। 

बीते कछू दिवस जवान भयो,
विद्धान गुनी धनवान भयो,
बल पौरुख तेज निधान भयो,
सुन्दर स्वरूप रसवान भयो,
सब घुसरि गयो सुघराया है,
पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है। 

Monday, February 6, 2017

ऑंसू


Author-जयशंकर प्रसाद

इस करुणा कलित हृदय में
अब विकल रागिनी बजती
क्यों हाहाकार स्वरों में
वेदना असीम गरजती?

मानस सागर के तट पर
क्यों लोल लहर की घातें
कल कल ध्वनि से हैं कहती
कुछ विस्मृत बीती बातें?

आती हैं शून्य क्षितिज से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती बिलखाती-सी
पगली-सी देती फेरी?

क्यों व्यथित व्योम गंगा-सी
छिटका कर दोनों छोरें
चेतना तरंगिनी मेरी
लेती हैं मृदल हिलोरें?

बस गयी एक बस्ती हैं
स्मृतियों की इसी हृदय में
नक्षत्र लोक फैला है
जैसे इस नील निलय में।

ये सब स्फुलिंग हैं मेरी
इस ज्वालामयी जलन के
कुछ शेष चिह्न हैं केवल
मेरे उस महा मिलन के।

शीतल ज्वाला जलती हैं
ईधन होता दृग जल का
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर
करती हैं काम अनिल का।

बाड़व ज्वाला सोती थी
इस प्रणय सिन्धु के तल में
प्यासी मछली-सी आँखें
थी विकल रूप के जल में।




बुलबुले सिन्धु के फूटे
नक्षत्र मालिका टूटी
नभ मुक्त कुन्तला धरणी
दिखलाई देती लूटी।

छिल-छिल कर छाले फोड़े
मल-मल कर मृदुल चरण से
धुल-धुल कर बह रह जाते
आँसू करुणा के कण से।

इस विकल वेदना को ले
किसने सुख को ललकारा
वह एक अबोध अकिंचन
बेसुध चैतन्य हमारा।

अभिलाषाओं की करवट
फिर सुप्त व्यथा का जगना
सुख का सपना हो जाना
भींगी पलकों का लगना।

इस हृदय कमल का घिरना
अलि अलकों की उलझन में
आँसू मरन्द का गिरना
मिलना निश्वास पवन में।

Saturday, January 28, 2017

पन्ना दाई

Author-सत्य नारायण गोयंक

चल पड़ा दुष्ट बनवीर क्रूर, जैसे कलयुग का कंस चला
राणा सांगा के, कुम्भा के, कुल को करने निर्वश चला

उस ओर महल में पन्ना के कानों में ऐसी भनक पड़ी
वह भीत मृगी सी सिहर उठी, क्या करे नहीं कुछ समझ पड़ी

तत्क्षण मन में संकल्प उठा, बिजली चमकी काले घन पर
स्वामी के हित में बलि दूंगी, अपने प्राणों से भी बढ़ कर

धन्ना नाई की कुंडी में, झटपट राणा को सुला दिया
ऊपर झूठे पत्तल रख कर, यों छिपा महल से पार किया

फिर अपने नन्हें­मुन्ने को, झट गुदड़ी में से उठा लिया
राजसी वसन­भूषण पहना, फौरन पलंग पर लिटा दिया

इतने में ही सुन पड़ी गरज, है उदय कहां, युवराज कहां
शोणित प्यासी तलवार लिये, देखा कातिल था खड़ा वहां

पन्ना सहमी, दिल झिझक उठा, फिर मन को कर पत्थर कठोर
सोया प्राणों­का­प्राण जहां, दिखला दी उंगली उसी ओर

Thursday, January 26, 2017

तिरंगा

भारत की संस्कृति का संगम ।
तीन रंग  का अपना परचम ।

केसरिया कश्मीर की घाटी
की सोंधी सी रंगत लेकर ।
वीर बहादुर पथ पर बढ़ाते
बलिदानो की चाहत लेकर।

रोज परखता दुश्मन का दम ।
तीन रंग का अपना परचम ।।

गंगा की पावनता के संग ।
हिमगिर की हिमवान धवलता।
धवल धवल यह बिजली दौड़ी
हर सैनिक में बनी चपलता ।

दुनिया इसका करती अनुगम ।
तीन रंग का अपना परचम ।।

देश द्रोहिंयो को भी फाँसी पर लटकाना बाकी है।

पहरा बहुत कड़ा होता है
सीना तान खड़ा होता है
घर परिवार बहुत छोटा  है
सबसे देश बड़ा होता है
भगतसिंह के सपनो का हिंदुस्तान बनाना बाकी है। 
देश द्रोहिंयो को भी फाँसी पर लटकाना बाकी है। 
आजादी के परवाने थे
भारत माँ के दीवाने थे
घरवालो से अनजाने थे
वन्देमातरम के गाने थे
भारत माँ के उन बेटो का मान बढ़ाना बाकी है
देश द्रोहिंयों को भी फाँसी  पर लटकाना बाकी है 
गोली सीने  पर खाते थे
जय जय भारत माँ गाते थे
और देश के खातिर हँसकर
सूली पर तो चढ़ जाते थे
अभी शहीदों का वह एहसास चुकाना बाकी है
देश द्रोहिंयों को फाँसी पर लटकाना बाकी है 
                                                                     

                                         Author :-नीरज कुमार शुक्ला 

हास्य कवि द्वारा लिखा एक व्यंग्य :-

अक्ल बाटने लगे विधाता ,
         लंबी लगी कतारें  । 
सभी आदमी खड़े हुवे थे ,
         कही नहीं थी नारी। 

 सभी नारियाँ कहाँ रह गई ,
          था ये अचरज भारी । 
पता चला ब्यूटी पार्लर में ,
          पहुँच गई  थी सारी । 

मेकअप की थी गहन प्रक्रिया ,
            एक एक पर भारी । 
बैठी थी कुछ इंतज़ार में ,
            कब आएगी बारी । 

उधर विधाता ने पुरुषो में ,
           अक्ल बाँट दी सारी । 
ब्यूटी पार्लर से फुर्सत पाकर ,
          जब पहुँची सब नारी । 

बोर्ड लगा था स्टॉक ख़त्म है ,
      नहीं अक्ल है अब बाकी।
रोने लगी सभी महिलाएं ,
        नींद खुली ब्रम्हा की ।

Tuesday, January 24, 2017

मनुष्य और सर्प

रामधारी सिंह "दिनकर "




चल रहा महाभारत का रण, जल रहा धरित्री का सुहाग, फट कुरुक्षेत्र में खेल रही, नर के भीतर की कुटिल आग। वाजियों-गजों की लोथों में, गिर रहे मनुज के छिन्न अंग, बह रहा चतुष्पद और द्विपद का रुधिर मिश्र हो एक संग। गत्वर, गैरेय,सुघर भूधर से, लिए रक्त-रंजित शरीर, थे जूझ रहे कौंतेय-कर्ण, क्षण-क्षण करते गर्जन गंभीर। दोनों रण-कुशल धनुर्धर नर, दोनों सम बल, दोनों समर्थ, दोनों पर दोनों की अमोघ,
थी विशिख वृष्टि हो रही व्यर्थ। इतने में शर के लिए कर्ण ने, देखा ज्यों अपना निषंग, तरकस में से फुंकार उठा, कोई प्रचंड विषधर भुजंग। कहता कि कर्ण ! मैं अश्वसेन, विश्रुत भुजंगों का स्वामी हूँ, जन्म से पार्थ का शत्रु परम, तेरा बहुविधि हितकामी हूँ।

Monday, January 23, 2017

माँ कह एक कहानी



Author-मैथिलीशरण गुप्त

माँ कह एक कहानी।
बेटा समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी
कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी
कह माँ कह लेटी ही लेटी, राजा था या रानी
माँ कह एक कहानी।

तू है हठी, मानधन मेरे,
सुन उपवन में बड़े सवेरे,
तात भ्रमण करते थे तेरे,
जहाँ सुरभि मनमानी।जहाँ सुरभि मनमानी!
हाँ माँ यही कहानी।

वर्ण वर्ण के फूल खिले थे,
झलमल कर हिमबिंदु झिले थे,
हलके झोंके हिले मिले थे,
लहराता था पानी।"लहराता था पानी,
हाँ हाँ यही कहानी।"

Saturday, January 21, 2017

किसान

पछिलहरा हरु माचियावति है,
दुइ पहर जोति घर आवति हैं,
तव चारा पानी लावति हैं
नांदै भरि बैल खवावति हैं,
नहि मिलत समय पर पानी हैं,
को कहै कि सुगम किसानी हैं ।    
                                                                          

मेहनत तौ आठौ याम करै
पल मरन कवौ विसराम करै
दिन रात बिचारे काम करै
तेहूँ पर रामहि राम करै
विधि की गति जाति न जानी हैं
को कहै कि सुगम किसानी हैं ।

नित सहना द्वारे खड़े रहैं
हाँ जिलेदारहू अड़े रहैं
उई कहौ कहां लगि कटे रहैं
पट वारी देउता अड़े रहैं
यह पद्धति बहुत पुरानी है
को कहै कि सुगम किसानी हैं ।


चाहे होय जेठ की धुप कड़ी
सावन भादौं की मेह झड़ी
या माघ पूस की ठंड बड़ी
गोई उनकी है मची खड़ी
बैसुआ मा वाह लगानी है
को कहै कि सुगम किसानी हैं ।