Friday, March 3, 2017

ॐ सह नाववतु।

ॐ सह नाववतु। 
सह नौ भुनक्तु। 
सह वीर्य करवावहै। 
तेजस्वि नावधीतमस्तु 
मा विद्विषावहै। 
ॐ शान्तिः  शान्तिः शान्तिः।। 

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः 
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु 
मा कश्चिद  दुःख भाग्भवेत। 
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।। 


इतनी शक्ति हमें देना दाता

इतनी शक्ति हमें देना दाता ,
मन का विश्वास कमजोर हो ना।
हम चले नेक रस्ते पे हमसे,
भूलकर भी कोई भूल हो ना। 

दूर अज्ञान के हो अंधेरे ,
तू हमें ज्ञान की रोशनी दे। 
हर बुराई से बचते रहे हम ,
जितनी भी दे भली जिंदगी दे। 
बैर हो ना  किसी का किसी से ,
भावना मन में बदले की हो ना। 

 इतनी शक्ति हमें देना दाता ,
 मन का विश्वास कमजोर हो ना। 
हम चले नेक रस्ते पे हमसे,
भूलकर भी कोई भूल हो ना। 

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो
तुम्ही हो बन्धु सखा तुम्ही हो।

तुम्ही हो साथी तुम्ही सहारे
कोई ना अपना सिवा तुम्हारे।
तुम्ही हो नैय्या तुम्ही खेवैय्या
तुम्ही हो बन्धु सखा तुम्ही हो.....

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो
तुम्ही हो बन्धु सखा तुम्ही हो।

जो खिल सके ना वो फूल हम है
 तुम्हारे चरणों की धूल हम है।
दया की द्रष्टि सदा हि  रखना
तुम्ही हो बन्धु सखा तुम्ही हो.....

तुम्ही हो माता पिता तुम्ही हो
तुम्ही हो बन्धु सखा तुम्ही हो। .   

Thursday, March 2, 2017

हे शारदे माँ , हे शारदे माँ


     हे शारदे माँ , हे शारदे माँ
    अज्ञानता से हमें तार दे माँ

 तू स्वर की देवी है संगीत तुझसे ,
 हर शब्द तेरा है हर गीत तुझसे।
    हम है अकेले हम है अधूरे ,
  तेरी शरण में हमें प्यार दे माँ ।।
    हे शारदे माँ , हे शारदे माँ.......

मुनियों ने समझी गुनियों ने जानी,
 वेदों की भाषा पुराणों की बानी।
हम भी तो समझें हम भी तो जाने
विद्या का हमको भी अधिकार दे माँ।
    हे शारदे माँ , हे शारदे माँ........ 

तू श्वेतवरणी कमल पे विराजे ,
हाथों में विणा मुकुट सर पे साजे।
अज्ञानता के मिटा दे अंधेरे ,
उजालो का हमको संसार दे माँ
    हे शारदे माँ , हे शारदे माँ

नर हो न निराश करो मन को


Author- मैथलीशरण गुप्त

नर हो न निराश करो मन को
कुछ काम करो ,कुछ काम करो
जग में रहकर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर  हो, न  निराश करो मन को।
                                                             
संभालो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
 नर  हो ,न  निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्व यहाँ
फिर जा सकता है सत्व कहाँ
तुम स्वत्व  सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर  हो न  निराश करो मन को।

Tuesday, February 7, 2017

बुढ़ापा


पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है ।  

  
निंदा की नीव बुढ़ापा है,
जीवन संताप बुढ़ापा है,
संस्तृत का पाप बुढ़ापा है,
पुरिखन की आस बुढ़ापा है,
देखतै तन थर थर कापा है,
पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है। 

बचपन मा कनिया चढ्यो खूब
मनमानी बातें गड्यो खूब,
घी दूध खाये कै बढ्यो खूब,
खेल्यो कूद्यो औ चल्यो खूब,
अब सोचि रह्यो का पापा है,
पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है। 

बीते कछू दिवस जवान भयो,
विद्धान गुनी धनवान भयो,
बल पौरुख तेज निधान भयो,
सुन्दर स्वरूप रसवान भयो,
सब घुसरि गयो सुघराया है,
पनु सबते गाढ़ बुढ़ापा है। 

Monday, February 6, 2017

ऑंसू


Author-जयशंकर प्रसाद

इस करुणा कलित हृदय में
अब विकल रागिनी बजती
क्यों हाहाकार स्वरों में
वेदना असीम गरजती?

मानस सागर के तट पर
क्यों लोल लहर की घातें
कल कल ध्वनि से हैं कहती
कुछ विस्मृत बीती बातें?

आती हैं शून्य क्षितिज से
क्यों लौट प्रतिध्वनि मेरी
टकराती बिलखाती-सी
पगली-सी देती फेरी?

क्यों व्यथित व्योम गंगा-सी
छिटका कर दोनों छोरें
चेतना तरंगिनी मेरी
लेती हैं मृदल हिलोरें?

बस गयी एक बस्ती हैं
स्मृतियों की इसी हृदय में
नक्षत्र लोक फैला है
जैसे इस नील निलय में।

ये सब स्फुलिंग हैं मेरी
इस ज्वालामयी जलन के
कुछ शेष चिह्न हैं केवल
मेरे उस महा मिलन के।

शीतल ज्वाला जलती हैं
ईधन होता दृग जल का
यह व्यर्थ साँस चल-चल कर
करती हैं काम अनिल का।

बाड़व ज्वाला सोती थी
इस प्रणय सिन्धु के तल में
प्यासी मछली-सी आँखें
थी विकल रूप के जल में।




बुलबुले सिन्धु के फूटे
नक्षत्र मालिका टूटी
नभ मुक्त कुन्तला धरणी
दिखलाई देती लूटी।

छिल-छिल कर छाले फोड़े
मल-मल कर मृदुल चरण से
धुल-धुल कर बह रह जाते
आँसू करुणा के कण से।

इस विकल वेदना को ले
किसने सुख को ललकारा
वह एक अबोध अकिंचन
बेसुध चैतन्य हमारा।

अभिलाषाओं की करवट
फिर सुप्त व्यथा का जगना
सुख का सपना हो जाना
भींगी पलकों का लगना।

इस हृदय कमल का घिरना
अलि अलकों की उलझन में
आँसू मरन्द का गिरना
मिलना निश्वास पवन में।

Sunday, February 5, 2017

लाठी के गुण

लाठी में हैं गुण बहुत, सदा राखिये संग,
गहरि नदी, नाली जहाँ, तहाँ बचावै अंग,
तहाँ बचावै अंग, झपटि कुत्ता कहँ मारे,
दुश्मन दावागीर होय, तिनहूँ को झारै,
कह गिरिधर कविराय, सुनो हे दूर के बाठी,
सब हथियार छाँडि, हाथ महँ लीजै लाठी।

By :- गिरिधर कविराय

अनपढ़ मंत्री

कैसे कोई कहि सकै बड़े- बड़ेन की भूल,
संसद माँ उई पहुँचिगे जी न गये स्कूल,
जी न गये स्कूल तबो  बनि  बैढ़े मंत्री,
मिलि गयी उनको कार साथ मा दुई -दुई संत्री,
कहते जी. डी. सिंह देश मा अब का होई,
बड़े -बड़ेन की बात कहये अब  कैसे कोई।

By :- जी. डी. सिंह